असफलता व दुःख का धोतकः ‘पितृदोष’

पितृदोष एक श्राप है जो यह बताता है कि पुर्वजन्म में आपके द्वारा किसी वृध्द पुरुष/महिला या बुजुर्ग दम्पति या फिर स्वयं के ही माता- पिता को ह्रदय विदारक कष्ट दिया गया है | इस जन्म में यदि किसी की जन्म पत्रिका में पितृदोष है तो वह यह भी इंगित करता है कि इस जन्म में आपके पोर्वजों द्वारा गलत कार्य किए गए हैं जिनका दुष्परिणाम आपको  पड़ता है | ऐसे व्यक्तियों की natural Natural death नही होती अतः ये पूर्ण आयु को प्राप्त नही होते और उनकी आत्मा इस प्रथ्वी लोक पर तब तक भटकती रहती है जब तक उसे दूसरा शरीर प्राप्त नही हो जाता (श्रीमदभगबत गीतः द्वितीय अध्याय)

मैंने अनुभव में देखा है कि पितृदोष प्रायः तीसरी पीढ़ी में अधिक  पाया जाता है | इसका कारण यह है कि परिवार में दादा/बाबा द्वारा गलत प्रकार से धन उपार्जन, धन हथिया लेना या किसी को जान बुझकर अत्यधिक कास्ट देना, ये ही पितृदोष के रूप में उभरकर आता है | उस समय पिता का जन्म हो चूका होता है अतः इस दोष का पूर्ण प्रभाव अर्थात पितृदोष तीसरी पीढ़ी में स्वतः ही आ जाता है |

माननीय सम्पादक महोदय द्वारा “पितृदोष विशेषांक”  निकाला जा रहा है जो एक विशेष संग्रहणीय अंक है क्योकि इस विषय पर उप्लाव्द जानकारी व उपाय बहुत ही कम लोगों को ज्ञात हैं तथा कई भ्रांतियां भी मौजूद हैं | निशचित ही यह अंक सभी समस्याओं से संबंधित (पितृदोष) समाधान प्रदान करेगा |

  पितृ योग कुंडली में- कुंडली में निम्न स्थतियों में पितृ योग का निर्माण होता है |

  1. सूर्य + राहु
  2. सूर्य + केतु
  3. सूर्य + राहु + शनि
  4. सूर्य + केतु +शनि
  5. सूर्य + चंद्र (अमावस्या)
  6. सूर्य + चंद्र + राहु
  7. सूर्य +चंद्र +केतु
  8. सूर्य + चंद्र + शनि
  9. चंद्र + राहु
  10. चंद्र + केतु
  11. चंद्र + शनी + राहु
  12. चंद्र + शनि + केतु

 उपरोक्त स्थितियों में पितृदोष का योग बनता है | इसके अतिरिक्त सूर्य या चन्द्रमा पर शनि, राहु की द्रष्टि, सूर्य का नीच राशि में जाना तथा पाप ग्रहों द्वारा देखा जाना भी इसी प्रकार की श्रेणी में आता है | उपरोक्त में से किसी भी प्रकार का योग जब लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम, दशम या एकादश भाव में हो तो उस भाव से संबंधित फल में कमी अति है | जातक का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है |त्रिक भावों (त्रतीय, छाठे, आठवें, या बारवें) में ये योग अधिक कष्टकर व् दुर्घटनाओं को बढाने वाला होता है | अनावश्यक यात्रा भ्रमण व व्यर्थ वाद-विवाद में फंसा देता है और मानसिक अवसाद का कारण भी बनता है |

पितृदोष के परिणाम-पितृदोष के परिणामस्वरुप जातक को सदैव या कभी-कभी अचानक ही बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है कि उसका कोई अति विशेष महत्वपुर्ण कार्य पूरा हो होने वाला है तभी अचानक कोई न कोई बाधा सामने आ जाती है | यह योग असफलता का धोतक है | जातक को यश प्राप्त नही होता तथा मन-सम्मान में सदैव कमी होती है | जीवन में दुःख, असफलता, गृह क्लेश, परिवार में किसी व्यक्ति की असामयिक मृत्यु परिवार में  किसी व्यक्ति को ह्रदय घात (heart attack) होना,किसी का मानसिक विक्षिप्ति होना,स्त्री/महिला का विधवा होना, बच्चों कि पढाई में बाधा आना आदि दुष्परिणाम वर्तमान में दिखाई देते हैं |

पितृदोष से पीड़ित जातक- कुंडली संख्या-1 ऐसे जातक की है जिसे अपने जीवन में दुःख व् कठिनाई के अलावा कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ | निशचित तौर पर इस पत्रिका में पितृदोष है और इस योग के दुष्फल जातक पर स्पष्ट हैं |

कुंडली संख्या-1

जन्म – 1/8 1980

समय- प्रातः 4.00 बजे

स्थान-ग्वालियर

मिथुन लग्न में लग्नेश बुध लग्न में है | लग्न व लग्नेस (बुध) से द्वितीय भाव में सूर्य + राहु मिलकर पितृदोष का निर्माण कर रहे हैं |(नियम-1) इस दोष पर केतु कि पूर्ण द्रष्टी है तथा किसी भी गृह की शुभ द्रष्टि नहीं है | द्वतीय भाव कुटुम्ब का होता है तथा इस भाव में पितृदोष होने से कुटुम्ब का सुख इस जातक को प्राप्त नहीं हुआ | जातक के दादा दादी माता पिता तथा इकलोते बड़े भाई का देहांत हो चूका है | जातक अकेला है | द्वातियेश चंद्रमा पर भी पाप प्रभाव है | चन्द्रमा पर मंगल शनि व् राहु की द्रष्टि है | किसी भी शुभ ग्रह की द्रष्टि नहीं है अतः दुष्फलो में अधिक वृद्धि हो गई | चन्द्रमा चतुर्थ भाव व् मन का भी कारक ग्रह है अतः इस भाव से संबंधित फल में भी कमी आई | जातक कई बार mental  depression में भी चला जाता है | जातक के कार्य कई आर्ट बनते-बनते श जाते हैं | युवावस्था में ही इस जातक को भयंकर कष्टों का सामना करना पडा तथा शिक्षा में भी कई अवरोध आए |

पितृदोष उपाय-

  1. पितरो के लिए घर में एक स्थान बनाएं तथा प्रतेक शुभ कार्य के समय उनको याद करे |म भोग व दीपक लगाए | प्रत्येक त्यौहार पर एसा अवस्य करे |
  2. पितरो कि शांति जिसे पिंडदान भी कहते हैं करबाए | यह शांति गया (बिहारी) में योग्य विद्वान ब्राह्मण से करबाए तो सर्वाधिक अच्छा रहेगा | यह स्थान पितरो का होता है तथा पितरो का यहाँ तत्काल शांति प्राप्त होती हे
  3. श्राध पक्छ में पितरो को जल तपर्ण करे|
  4. श्राद्ध पक्छ में गंगा किनारे पितरो कि शांति व हवन यज्ञ करवाए |
  5. श्राद्ध पक्छ में पितृ मोछ अमावस्या के दिन योग्य विद्वान ब्राह्मण से पितृदोष शांति कराये इस दिन व्रत धारण करें व् ब्राह्मण को भोजन कराये हवं यग अदि करवाए |
  6. प्रतेक अमावस्या को भगवन्म श्री सत्यनारायण की कथा कराये व् बरत करे
  7. अमावस्या को कच्चा दूध मंदिर या ब्राह्मण को दान में दे
  8. प्रातः सूर्य नमस्कार अवस्य करे व् अघ्र्य दे |
  9. बुजुर्गो का आशिर्वाद लें |
  10. त्रिशक्ति लाकेट (लग्नेश + पंचमेंश + भाग्येश) धारण करे तथा घर में शुभ मुहूर्त में ‘बंधन मुक्ति यंत्र’ अवश्य लगाये

नोट-

उपरोक्त दोनों सौभाग्य दीप संख्या में उपलब्ध हैं