कुंडली का सार: महा – दशानाथ

महा दशानाथ से तात्पर्य महादशा का नाथ या स्वामी है इसका कुल समय ही महादशा कहलाता है प्रतेक ग्रह की महादशा एक नियत समय होती है जातक का जन्म एक नाचत्र विशेष मे होता है तथा उसी नचत्र के स्वामी से जातक की महादशा निकलती है तथा उसके आगे क्रमानुसार महादशा की गाड़ना ज्योतिष करता है ग्रह की शुभ –अशुभ स्थिति के अनुसार ही महादशा मे फल की प्राप्ति होती है यदि कुंडली मे फल की प्राप्ति होती है यदि कुण्डली मे कारक व् शुभ ग्रह की महादशा है तो जातक का जायदा समय होता है यदि आकारक व् पाप ग्रह की महादशा है तो जातक को कष्ट भोगना पद सकता है जातक को प्राप्त महादशा प्रारब्ध का परिणाम है फलित मे महादशा नाथ की महत्वपूर्ण भूमिका है हलाकि भविष्य की जानकारी हेतु अन्त्द्रशानाथ

व् गोचर की गाड़ना महत्वपूर्ण है .

सूर्य की महादशा सबसे कम समय 6 साल के लिए होती है जबकि सबसे लम्बी महादशा शुक्र की 20 वर्ष होती है यह पर विचारणीय तथ्य यह है की सूर्य मात्र 6 वर्ष मे ही रजा बना सकता है यदि भ म्हाद्शानाथ है और कारक भाव का स्वामी होकर शुभ स्थति मे है व्ही इसके विपरीत यदि यह अकरक एवं दुष्प्रभाव मे है तो मात्र 6 वर्षो मे ही भिखारी बना सकता है कहने का तात्पर्य यह है की ग्रह महादशा के कार्यकाल के अनुसार ही शुभ या बिपरीत परिणाम प्रदान करता है सर्वप्रथम मै ग्रहों की दशा अवधि बताना चाहता हू.

कंप्यूटर द्योरा 120 वर्ष की महादशा दी जाती है चाहे कोई भी राशी गढ़ से स्मंधित हो उपरोक्त क्क्रमानुसार महादशा प्राप्त होती है यदि किसी  की रहू की महादशा समाप्त हो रही है

कोई भी जातक जिसे जन्म की महादशा पता करना हो वः आसानी से जान सकता है उदाहरन के लिए यदि जातक का जन्म कृतिका नचत्र मे हुआ है तो उसको जन्म के समय सूर्य की महादशा प्राप्त होती है | इसी प्रकार यदि किसी जातक का जन्म मघा नछत्र का है तो उसे जन्म के समय केतु की महादशा प्राप्त होगी | महादशा भोग्याकाल की गणना ज्योतिष दुवारा की जाती है यह जरुरी है की नहीं है की यदि किसी जातक का जन्म कर्तिका नाचत्र मे हुआ है तो उसे सूर्य की पूरी महादशा 6 वर्ष प्राप्त होंगे इसका कारण यह है की नाचत्र को भी चरणों मे बांटा गया है | इसके अनुशार ही प्रारंभिक महादशा की गणना की जाती है यहाँ पर यह स्पस्ट है की यदि किसी जातक की सूर्य की महादशा पूरी हो गई है तो उसे अगली महादशा चन्द्रमा की 10 वर्ष पूरी प्राप्त होगी यहा महादशा पूरी प्राप्त होगी | इसी  प्रकार यदि किसी की रहू की महादशा पूरी हो गए है तो उसे क्रमानुसार गुरु , शनि सहित सभी ग्रहों की महादशा प्राप्त होगी|

मैंने ग्रह व् नचत्र तालिका मे स्पस्ट बताया की महादशा कर्म मे रहती है शुक्र के बाद पुन: सूर्य की महादशा प्राप्त होती है 9 ग्रहों की म्हाद्शाओ का योग 120 वर्ष होता है कंप्यूटर द्योरा महादशा की गणना आसानी से प्राप्त हो सकती है ग्रहों का रजा सूर्य है भी नाचार्ता करजा पुष्प है जिसका स्वामी शनि है.

 जन्म कुण्डली मे ग्रह की स्थिति निर्धारित करती है की महादशा कैसी जाएगी यदि कुण्डली मे ग्रह कारक भाव का स्वामी होकर स्वराशी या उच्च का , शुभ ग्रहों से युत या द्रस्त , कारक स्थान पर स्थित है तथा उसे नचत्र भी कारक प्रोत है तो जातक के जीवन की सर्वसेष्ठ महादशा कहलाती है.

मैंने अनुभव मे देखा है की शुभ ग्रह बुध ,शुक्र ,चन्द्र ,कारक भाव के स्वामी होकर उच्च या स्वराशी मे स्थित हो तो ऐसे ग्रह की महादशा जन्म कल के प्रारम्भिक समय या ब्र्द्धाअवस्था मे प्राप्त होती है कारण स्पस्ट है की उच्च के ग्रह तभी प्राप्त होते है जब पिचले जन्म के शुब कर्म किये हो वह व्यक्ति सर्वाधिक भाग्यशाली है जिसे उच्च के ग्रह की महादशा प्राप्त हो |

कई बार देखने मे आया है की पूरी कुण्डली मे शिर्फ़ एक उच्च का ग्रह की महादशा पूरा जीवन संवार देती है वही इसके विपरीत निचे के ग्रह की महादशा जीवन उथल – पुथल मचा देती है

विद्यार्थियों के जीवन मे बुध की महादशा सबसे अच्छी होती है धर्म और अध्यात्म से जुडाव के लिए गुरु व् शनि की महादशा अच्छी है.

 महादशा के अतिरिक्त अन्तदर्शा भी होती है मैंने अनिभव मे देखा है की यदि शनि की महादशा व् रहू की अन्तदर्शा हो या राहू की महादशा व् शनि की अन्तदर्शा हो तो यह समय किसी का अच्छा नही गया , चाहे रहू व् शनि किसी भी लग्न या राशी मे स्थित क्यों न हो यह कठिन कल सिद्ध होता है बड , गुरु , शुक्र की महादशा प्राय: अच्छी ही जाती है पाप ग्रहों की महादशा मे कस्ट अवश्य प्राप्त होता है.