गोचर फल- एक अध्ययन

गोचर से तात्पर्य उन द्रहों के भ्रमण से है जो वर्तमान में विभिन्न द्वादश राशियों में भ्रमण कर रहे हैं | जन्मकाल के समय जातक की कुंडली में स्थित ग्रहों के सापेक्ष वर्तमान में भ्रमण करने वाले ग्रहों का अध्ययन ही गोचर कहलाता है |

जहाँ एक श्रेष्ठ ज्योतिषी बनने के लिए फलित सटीक होना आवश्यक है वहीँ फल कथन (फलित) के सटीक होने में गोचर की भूमिका अत्यंत ही महत्वपुर्ण हो जाति है | गोचर का महत्त्व प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक बना हुआ है | ग्रहों की गति हमेशा ही बनी रही है |

ज्योतिष में शोधपरक कार्यों में गोचर का बहुत महत्त्व होता है क्योंकि बड़े ग्रहों (जैसे शनि, गुरु, राहु, केतु) का पुनः उसी स्थान से भ्रमण होना प्रायः घटना की पुनरावृत्ति का संकेत होता है | गोचर के माध्यम से ही एक ज्योतिषी जातक का दैनिक, मासिक या वार्षिक भविष्य कथन कर सकता है |

गोचर की गणना चन्द्र राशि के आधार पर की जाती है | यदि चंद्रमा बली नहीं है अर्थात अंशों में कम या अमावस्या का है तो इस स्थिति में लग्न से ग्रहों का भ्रमण अधिक सटीक प्रभावशाली मानते हुए गोचर का भविष्य फल कथन करना उपयुक्त रहता है तथा फलित भि अधिक सटीक होता है |

यदि किसी जातक की कुंडली में महादशा और अन्तद्रशा दोनों ही योगकारक ग्रह की चल रही है तथा उस जातक का गोचर भी उच्छा हो तो वह उस जातक का गोचर भी अच्चा हो तो वह उस जातक के जीवन का सर्वश्रेष्ट समय होता है | इस समय का यदि जातक सदुपयोग करे तो उसे हर कार्य में सफलता मिलती है | मेहनत का शुभ परिणाम शीघ्र ही प्राप्त होती है | जातक सफलता की उन ऊँचाइयों को छूता है जिसकी कल्पना वह स्वयं नही कर सकता | इस प्रकार की स्थिति बहुत ही अल्प देखने में आयी है | यह स्थिति प्रारब्ध की देन है | ठीक इसके विपरीत यदि किसी जातक की कुंडली में महादशा और अंतर्दशा दोनों ही जातक के लिए हिक नहीं हैं तब इस स्थिति में मैंने देखा है कि उस जातक के लिए गोचर का महत्त्व बहुत बाढ जाता है |

दैनिक फल कथन में चंद्रमा का गोचर महत्वपूर्ण होता है | यदि चंद्रमा जन्म राशि से चतुर्थ, षष्ट, अष्टम या द्वादश स्थिति में हो तो कार्यों में विध्न, मानसिक कष्ट अवश्य देता है | मैने अनुभव में यह देखा है कि चतुर्थ चंद्रमा में यात्रा की जाये तो यात्रा में कष्ट अवश्य होता है |

गोचर में मुख्यतः गुरू, शनि, राहु व केतु का महत्त्व अधिक है क्योंकि यह ग्रह लम्बी अवधि का भ्रमण करते हैं | जैसे गुरू या बृहस्पति ग्रह गोचर में एक राशि में 12 महीने, शनि की भ्रमण एक में 2.5 साल तथा राहु व केतु का भ्रमन एक राशि में 1.5 साल तक रहता है | गोचर जातक कोजीवन के हर खंड में प्रभाविक करता है | ये बड़े गोचर में कैसे प्रभाव डालते हैं | इसका सूक्ष्म विशलेषण जो मेरा व्यावहारिक अनुभव व गत वर्षों का शोध है निम्न प्रकार से वर्णित है |

गुरू (ब्रहस्पति)- गोचर में गुरू का भ्रमण काफी अधिक महत्वपुर्ण स्थान रखता है | खासकर विवाह के संबंध में तो गुरू का भ्रमण निर्णायक भूमिका अदा करता है |

मैंने अनुभव में देखा है कि यदि कन्या जातिका का गोचर में गुरू उस कन्या की चंद्र राशि से चतुर्थ, अष्टम या द्वादश स्थान से भ्रमण कर रहा हो तो विवाह में बाधा अवश्य आती है | इस स्थिति में विवाह की अनुमति शास्त्र भी प्रदान नहीं करते हैं | परिहार के तौर पर गुरू का पिला दान करवाया जाता है परन्तु वह अधित समय तक शुभ परिणाम नहीं दे पता | कारण यह है कि गुरू का भ्रमण 1 वर्ष का होता है तथा योग्य विद्वान ब्राह्मण से यह कार्य सम्पन्न होते हुए मैंने कम ही देखा है |

मेरा यह कटु अनुभव रहा है कि यदि गुरू का भ्रमण चंद्र राशि से चतुर्थ, अष्टम या द्वादश स्थान से हो तो माता-पिता को वर की तलाश भी नही करना चाहिए |

क्योंकि इस स्थिति में पिता अपनी पूरी उर्जा, धन, समय लगा देता है और जब उचिटी समय आता है तो वह थक हर के बैठ जाता है | कार्य का शुभ परिणाम प्राप्त करनेकाक  का शुभ समय का ज्ञान ज्योतिष के माध्यम से किया जा सकता है और धन व् समय की बचत की जा सकती है |

कन्या जातिका के लिए गुरू के गोचर का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है क्योकिं उसकी कुंडली में गुरू पति व सुखद दाम्पत्य जीवन का एक मात्र करक ग्रह है | यदि लड़की की कुंडली में गुरू अच्छा है तो उसे अच्छा वर तो प्राप्त होता ही है साथ ही सुखी दाम्पत्य जीवन भी व्यतीत होता है |