आओ ज्योतिष सीखें

अखिल ब्रम्हाण्ड में पे जाने वाले 9 ग्रह अर्थात बुध, केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरू, शनि है | सरू तथा केतु छाया ग्रह हैं | कुंडली देखने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक ग्रह की प्रकृति की जानकारी हो तभी ज्योतिष में सटीक फलित (भविष्यवाणी) संभव है | ग्रहों की श्रंखला में मैं सर्वप्रथम ब्रहस्पति (Jupiter) अर्थात गुरू के बारे में जानकारी दे रहा हूँ |

ब्रहस्पति (Jupiter)- ब्रहस्पति जिसे हम सामान्यत गुरू भी कहते हैं इस सौर मण्डल में पाए जाने वाले ग्रहों में सबसे बड़ा ग्रह है जिसका आयतन प्रथ्वी के आयतन का लगभग 1300 गुना है | यह ग्रह मुख्यतः गैस एवं द्रव से मिलकर बना हुआ है | सभी ग्रहों में इस ग्रह के घूर्णन की गति सर्वाधिक तीव्र है | अभी तक इसके 50 से भी ज्यादा उपग्रह ज्ञात हो चूका हैं |

ब्रहस्पति अर्थात गुरू काल पुरुष का विवेक है | यह कफ प्रकृति, आकाश तत्व (वायु कारक), पीत वर्ण (पिला रंग धारण किए हुए), पूर्वोत्तर दिशा का स्वामी तथा पुरुष जाति (male category) का ग्रह है | यह शुभ तथा सौम्य ग्रह है | इससे परलोक तथा आध्यात्मिक सुखों का विचार किया जाता है | यह काल चक्र कि दो राशि धनु तथा मीन का स्वामी है | यह कर्क राशि (अंक 4) में उच्च का तथा मकर राशि (अंक 10) में नीच का हो जाता है |नीच राशि अर्थात मकर (noNo. 10) में गुरू शुभ फल देने में सक्षम नहीं है जब तक कि उसकी नीचता भंग (नीच भंग योग) नही हो जाती |

मनुष्य के बाह्य व्यक्तित्व क्ले प्रथम रूप विचार का प्रतीक बृहस्पति है | बृहस्पति प्राणी मात्र के शारीर का प्रतिनिधित्व करता है तथा शारीर संचालन हेतु आवश्यक रक्त प्रदान करता है |प्रत्येक जीवित प्राणी के रक्त में रहने वाले जीवाणुओं की चेतना का सीधा-सीधा संबंध बृहस्पति से ही होता है | आत्मिक द्रष्टिकोण से यह ग्रह मनुष्य के विचारों तथा मनोभावों का एकीकरण करता है | मृदुला स्वभाव, ज्ञान, भक्ति, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र तथा सौन्दर्यप्रियता का प्रतीक भी बृहस्पति को मन जाता है | अनात्मिक द्रष्टिकोण से न्याय, कानून, व्यापर-व्यवधान, मंदिर,पूजा-पाठ, पठन-पाठन व दान धर्म अदि का प्रतिनिधित्व करता है|

गुरू ग्रह ज्ञान का प्रतीक है तथा शास्त्रानुसार यदि कुंडली में सभी ग्रह खराब हों अर्थात शुभ फल देने में असमर्थ हों (गुरू को छोड़कर) तब कुंडली में एक अकेला गुरू ग्रह ही सभी प्रकार के सुख देने में सक्षम है | संक्षेप में कुंडली में उपस्थित लाखों दोषों का हरण करने वाला एक मात्र ग्रह गुरू ही है | कुंडली में यदि गुरू ग्रह शुभ स्थिति में न है (शनि, राहु के साथ युति या द्रष्टी में न हो) तो निम्नलिखित लाभ प्रदान करता है | ब्रहस्पति ग्रह ज्ञान का कारक है | गुरू ग्रह ज्ञान प्रदान करता है | बाल्यकाल जीवन से अंत तक, सूक्ष्म ज्ञान से लेकर आध्यात्मिक ज्ञान गुरू से ही प्राप्त होता है |

गुरू से सभी प्रकार की सुख-सुविधाए,विपुल धन, भूमि संपदा, उच्च कोटि का वाहन, बड़ा भवन, भाग्य, मन-सम्मान,पुत्र-पौत्र अदि सभी सुख प्राप्त होते हैं |

स्त्री के लिए सौभाग्य का एक मात्र कारक ग्रह गुरू ही है अर्थात श्रेष्ठ पति सुख तभी प्राप्त होगा जब गुरू ग्रह अच्छा हो (पापग्रह शनि, राहु के साथ न हो) |

गुरू ग्रह से अच्छी शिक्षा, श्रेष्ठ गुरुओं का मार्गदर्शन भाग्य, आयु, प्रतिरोधक क्षमता, दैवीय शक्ति, धर्म, विदेश यात्रा, पूण्य, तीर्थ यात्रा, मोक्ष अदि सुख प्राप्त होते हैं |

नोट- गुरू की महादशा में सभी फलों की प्राप्ति संभव है |