मंगलकारी मंगल व कल्याणकारी शनि

ज्योतिष में मंगल व शनि को सर्वाधिक महत्व दिया गया है| मंगल को मांगलिक के रूप में अत्यन्त कठोर बताया गया है| तथा शनि को दुख का कारक कहा गया | यहां पर एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया वह यह की वर या कन्या की कुण्डली में लिखी एक के मांगलिक होने पर तथा दुसरे की कुण्डली में मंगल के स्थान पर शनि की स्थिति (1,4,8,12 भाव में) होने पर विवाह हुआ और परिणाम संतोषजनक रहे| अन्य ग्रहों से मंगल को क्रॉस करवाया गया तो विवाह के बाद समस्या हुई | महत्वपूर्ण बात यह है कि मंगल को शिर्फ़ शनि से ही क्रॉस करवाना श्रेष्ठ क्यों है यह एक चिंतनीय बात है| इस विषय पर मै इस लेख मे चर्चा करूँगा | अब मे मंगल व् शनि ग्रह के संबंध मे बिस्तृत रूप से बताऊंगा | ज्योतिष मे हमे ग्रह की उत्पति तथा उसके स्वभाव के सम्बंध मे पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है सर्वप्रथम मै शनि के समंध मे बता रहा हू| “”नीलांजन समाभांस रविपुत्रम यमाग्रजम | छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम नमामि शनैश्चरम | जैसा कि हम सभी जानते है कि इस स्रष्टि का आधार सूर्य कि परिक्रमा लगा रहे है | शनिदेव सूर्य के पुत्र है सभी ग्रह उनके पिता की परिक्रमा लगा रहे है | अत: सभी ग्रहों मे सम्माननीय स्थिती अपने आप बन रही | हम सभी जानते है कि मृत्यु के देवता यमराज के पास एक दिन सभी को उपस्थित होना पडता है | हमारे अच्छे-बुरे कर्मो का लेखा – ज़ोखा चित्रगुप्त जी के पास होता है और उसका परिणाम यमराज के हाथो मे होता है | इसी परिणाम के आधार पर हमारी गति सुनिश्चित की जाती है (स्वर्ग नरक वगेरह ) महत्वपूर्ण बात यह है कि शनिदेव यमराज के भाई है | अंत उनकी शक्ति और बद गई|

अब प्राचीन कल की स्थिति पर गौर करे कि जब किसी का परिचय पुछा जाता था या बताया जाता था तो अनपे गुरु के बारे मे बताया जाता था | व्यक्ति (ऋषियों या तपस्वियो ) की पहचान उनके गुरु से अधिक मजबूत व् शक्तिशाली दिखाई पड़ती है | शनिदेव के गुरु भगवान शिव शंकर है | शिवजी ने ही शनि महाराज को पिता के तुल्य प्रचंड ताप व् बल प्रदान किया | उनके अन्दर विधमान गुणों को देकते हुए इस प्रथ्वी का सबसे महत्वपूर्ण न्यायधीश का पद प्रदान किया | जहा सूर्य को दिन मे बही शनिदेव को रात्रि मे पूर्ण सत्ता प्राप्त है | अथार्त रात्रि पर पूर्ण अधिकार शनिदेव का है |

अब शनिदेव के मित्रो के सन्दर्भ मे बात की जाए तो उनमे बुद्धि बुध ,कूटनीतिज्ञ , रहू भैरव व् रूद्र अवतार हनुमान जी | नवग्रहों मे सर्वोच्च स्थिति तो शनिदेव की स्वत: ही बन रही है | यहा पर एक विचारणीय तथ्य सामने आया वः यह की शनिदेव की बहन है युमना जी | युमना जी का महत्व् इससे ही पता चलता है की जितने भी महँ रजा हुए उन्होंने युमना के किनार की राज्य किया चाहे आगरा हो , मथुरा हो या फिर देल्ली |

नोट: यहाँ पर मै एक महत्वपूर्ण बात बताना चाहता हू . की मैंने शोध मे देखा है की जिन छात्रों ने रात्रिकालीन अध्यन की उन्होंने उन छात्रों की अपेछा अधिक अंक व् जल्दी सफलता हासिल की जो प्रात: 4 बजे उठकर पड़ते थे | वर्तमान मे भी बही शोथ जारी है |यहाँ छात्रों की कुंडली मे शनि की स्थिती देखना चाहिए | रात्रि मे अध्ययन करने से शनिदेव का आशीर्वाद भी प्राप्त होंगा | श्री मदभागवत गीता मे भी लिखा है की सयमी पुरुष रात्रि मे जागते है |

शनि बहुत परिश्रम गंभीर खोजी तथा आत्मचिंतन करने बाला ग्रह है | जीवन शक्ति प्रदान करता है और दिघार्यु बनाता है | अष्ट्मेष के साथ –साथ  शनि का अच्छा होना भी पूर्ण आयु के लिए आवश्यक है | शनि व्यवहारीक ज्ञान प्रदान करता है | शनि संघर्ष करवाता है व् संघर्ष के बाद सफलता दिलवाता है | शोधपरक कार्यो जैसे पीएचडी के लिए शनि का कुंडली मे महत्वपूर्ण स्थान है | शुक्र के बाद सर्वाधिक 19 साल की महादशा शनिदेव की होती है गोचर मे शनि एक राशी मे लगभग ढाईसाल चलता है जो अन्य ग्रहों की अपेचा सर्वाधिक समय है | गोचर मे शनि का भ्रमण साडेसाती के रूप 2 राशियो मे से 5 राशियो को शनि प्रभाबित करता है | कुल मिलाकर कालचक्र की बारह राशियो मे से 5 राशियो को शनि प्रभाबित करता है अत: मानव जीवन पर शनि का प्रभाव ज्यादा रहने से भी शनि को महत्व दिया गया |